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Supreme Court to hear a plea seeking directions to cancel CBSE Class 12th exam | एग्जाम रद्द करने की अर्जी पर SC में सुनवाई सोमवार तक टली, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका की कॉपी बोर्ड को देने को कहा

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23 मिनट पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

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शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में 12वीं की बोर्ड परीक्षा रद्द करने को लेकर सुनवाई हुई। इस दौरान जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने सुनवाई की। उन्होंने पिटीशनर एडवोकेट ममता शर्मा से पूछा कि क्या CBSE के वकील को याचिका की एडवांस कॉपी दी गई थी। इस पर उन्होंने कहा कि वह कॉपी आज बोर्ड को भेजेंगी। इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि सुनवाई से पहले ये कॉपी आपको देना होगा। इसके बाद सुनवाई को सोमवार तक के लिए टाल दिया गया।

याचिका में जल्द नतीजे घोषित करने की मांग
इससे पहले याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार, सीबीएसई और सीआईएससीई को निर्देश दिया जाए कि वह कोरोना के मद्देनजर 12वीं का पेपर रदद् करें। याचिका में न सिर्फ परीक्षा कैंसिल करने बल्कि जल्द से जल्द नतीजे भी घोषित करने की अपील की गई है। पिटीशनर एडवोकेट ममता शर्मा कहती हैं, ‘यूनस्को के आंकड़ों के मुताबिक 2018 में 7.three लाख बच्चों ने 12वीं के बाद विदेशों में पढ़ाई का ऑप्शन चुना था। CBSE 12वीं की परीक्षा को लेकर पहली सुनवाई आज होनी है। ऐसे में अगर जून के दूसरे या तीसरे हफ्ते तक रिजल्ट घोषित नहीं हुए तो बच्चों का यह साल बर्बाद हो जाएगा।’

जब कोर्ट वर्चुअल, क्लास वर्चअल तो एग्जाम ऑफलाइन क्यों?

ममता शर्मा कहती हैं, ‘जब कोर्ट वर्चुअल, क्लास वर्चुअल तो फिर एग्जाम ऑफलाइन क्यों? परीक्षा से ज्यादा बच्चों की जान कीमती है। परीक्षा के लिए उनकी जान को जोखिम में तो नहीं डाल सकते। 1.5 करोड़ बच्चों की बात करने वाली सरकार इन्हीं की आवाज को अनदेखा कर रही है।’

23 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक से पहले शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने सोशल मीडिया पर बच्चों से उनके सुझाव मांगे थे। उनकी ट्विटर वॉल सुझावों से भरी पड़ी है। बच्चे CBSE की परीक्षा कैंसिल करने के पक्ष में हैं। लेकिन शिक्षा मंत्री निशंक ने बैठक में एक बार भी इस चिंता और सुझाव को जाहिर नहीं किया।’

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परीक्षा कैंसिल करने की मांग को लेकर पिटीशनर के 5

प्रमुख तर्क

  • परीक्षा कैंसिल करने के पीछे सबसे पहला तर्क आर्टिकल 21 यानी जीने के अधिकार का है। इसमें कहा गया है कि कोरोना संक्रमण जानलेवा है। एक संक्रमित व्यक्ति सैकड़ों लोगों को संक्रमित कर सकता है। ऐसे में बच्चों को सेंटर्स पर बुलाकर परीक्षा दिलवाना क्या उन्हें खतरे में डालना नहीं है? केवल बच्चे ही क्यों उनके मां-बाप, परिवार, टीचर सबके लिए यह खतरनाक साबित नहीं हो सकता है?
  • कुछ प्रस्ताव चुनिंदा विषयों की परीक्षा कराने और समय कम करने के हैं। क्या संक्रमण के लिए एक सैकेंड भी काफी नहीं है? क्या परीक्षा के घंटों को आधा कर देने से संक्रमण नहीं फैलेगा?
  • देश के बहुत सारे परिवार किसी न किसी ट्रेजडी से गुजर रहे हैं। ऐसे में क्या बच्चों की पढ़ाई होनी संभव है? संक्रमण के डर के साए में दी गई परीक्षा के जरिए बच्चों का सही मूल्यांकन हो पाएगा?
  • परीक्षा कैंसिल करने की मांग के पीछे पिटीशनर ने 18 साल से कम उम्र के बच्चों को वैक्सीन नहीं लगने का तर्क भी दिया है।
  • पिटीशनर ऑनलाइन परीक्षा के पक्ष में भी नहीं हैं। क्योंकि गांव और दूरदराज के इलाकों में रह रहे बच्चों के सामने इंटरनेट की समस्या होगी। इसलिए फिलहाल परीक्षा कैंसिल करना ही बच्चों के हित में होगा।

परीक्षाएं कैंसिल हुईं तो क्या एसेसमेंट का मॉडल कोई मॉडल है?
पिटीशनर ममता शर्मा कहती हैं कि इससे पहले हुईं इंटर्नल परीक्षाएं मूल्यांकन का एक मॉडल हो सकती हैं। लेकिन यह एक तरीका है। एक्सपर्ट्स से बात कर और भी रास्ते निकाले जा सकते हैं। पिछले साल 10वीं और 12वीं की परीक्षा में कुछ पेपर के एग्जाम नहीं हो पाए थे तो दूसरे पेपर में आए नंबरों के आधार पर बचे हुए पेपर्स का भी मूल्यांकन कर दिया गया था। हालांकि इस साल स्थिति अलग है। बच्चों ने एक भी पेपर नहीं दिया है। लेकिन पिछली साल भी तो एक रास्ता तुरंत निकाला गया था तो अगर हम चाहेंगे तो इस बार भी कुछ रास्ते निकलेंगे।

ऐसी यूनिवर्सिटीज जहां पर्सेंटेज के आधार पर एडमिशन होते हैं वहां क्या होगा?
पिटीशनर कहती हैं कि हम यहां बच्चों के लिए एंट्रेंस एग्जाम करवा सकते हैं। रास्ते तब निकलेंगे जब बच्चों की जगह खड़े होकर सोचेंगे। बच्चे डरे हुए हैं। इस समय अगर उन्हें सेंटर तक बुला भी लिया गया तो वे बेखौफ होकर परीक्षाएं नहीं दे पाएंगे तो एसेसमेंट तो वैसे भी सही नहीं हो पाएगा।

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